मा‌ॅं : एक अनोखा एहसास

कोमल सी गुलाब की पंखुड़ि है माॅं,
अनमोल जैसे मृग की कस्तूरी है मॉं,
कवि की कल्पना से भी बाहिर
क्या कहें कि कितनी नूरी है मॉं ।

जब मैं तेरे गर्भ में था,
ममता की उस कोख़ में था,
आंखें मेरी मूंदी थी मॉं
तू ही जहान पूरी थी मॉं ।
हो कष्ट अगर तो जितना हो,
था प्रेम कहीं न उतना हो,
पग-पग पर तू संभली थी मॉं
मुझको क्या ही कमीं थी मॉं ।

नौ माह मेरे जो पूर्ण हुए,
तेरे यंत्रण सम्पूर्ण हुए,
इक ही वो दुर्लभ क्षण था मॉं
जब मैं रोया तू हसी थी मॉं ।
तेरे सीने की वो गर्मी,
तेरे हाथों की वो नर्मी,
संसार मेरा तुझमें था मॉं
तू आकाश तू ही जमीं थी मॉं ।

जो मैं तनिक सा बड़ा हुआ,
तो रोग मुझे था कड़ा हुआ,
थी साॅंस तेरी अटकी सी मॉं
थी तू कहीं भटकी सी मॉं ।
हर मन्नत तूने कर डाली,
हर पुस्तक को भी पढ़ डाली,
था तेरे दिल का टुकड़ा मॉं
मैं हसी और तू मुखड़ा मॉं ।

जो ठीक मैं होने को चला,
जो होता क्यों ना मैं भला,
स्नेह-आशीष तेरा था मॉं
तूने तब सांस भरा था मॉं ।
अब तक था मुझको होश कहां,
था बचपन अब मेरा आया,
बचपन की पहली याद तू मॉं
उस घर की थी बुनियाद तू मॉं ।

वो घर का छोटा सा होना,
उस घर का छोटा सा कोना,
जिसमे रोटी चीनी थी मॉं
रसोई वही अपनी थी मॉं ।
आंटे की वो चिड़िया जो थी,
लकड़ी की वो पिढिया जो थी,
था बचपन मेरा उसी में मॉं
तू थी हर पल हर क्षण में मॉं ।

स्कूल का था जब वक़्त आया,
तूने मुझको जब पहुंचाया,
आंख मेरी क्यों नम थी मॉं
जब कि पास मेरे हरदम थी मॉं ।
शायद ये बचपन का दोष ही था,
आदत आंचल के कोश का था,
नैनों को तेरी तलाश थी मॉं
आज़ादी की तू आस थी मॉं ।

अर्थ कभी जो नहीं रहा,
पर स्वार्थ तुझे ना कभी हुआ,
पापा की तू ताकत थी मॉं
तुझसे ही हर बरकत थी मॉं ।
क्या क्या तुमने ना सहा तभी,
हर मोड़ विमोड़ पर डटी रही,
क्या तू थकी नहीं थी मॉं
कैसे डटी खड़ी थी मॉं ।

स्कूल में आगे बढ़ते हुए,
इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हुए,
हिंदी बंग्ला फीका था मॉं
जो तुझसे मैंने सीखा था मॉं ।
जो क्लास हमारे बढ़ते रहे,
दिन भर विषयों से लड़ते रहे,
तेरा हम पर विश्वास था मॉं
कुछ कर जाएँ ये आस था मॉं ।

स्कूल के दिन जो पूरे हुए,
हर आंख मुझी को घूरे हुए,
तुझसे ही तो सीखा था मॉं
आगे बढ़ते रहना था मॉं ।
दाखिला हुआ जब कॉलेज में,
तब भी तुमने ही पहुंचाया,
इस बार मगर तू रोई थी मॉं
जैसे जान कहीं खोई थी मॉं ।

चार वर्ष जो बीते कॉलेज के,
नौकरी की थी तब होड़ लगी,
तब हाथ तुम्हीं ने थामा था मॉं
और धैर्य तुम्हीं ने बांधा था मॉं ‌‌।
सफल हुआ नौकरी मिली,
उस खुशी में लिपटी तू खिली खिली,
तेरा तारा सितारा था मॉं
हर पल तेरा सहारा था मॉं ।

नौकरी मिली जो दूर गया,
मॉं का आंचल भी छूट गया,
पर तुझसे मेरा नाता मॉं
हो बारिश में जो छाता मॉं ।
आवाज़ तेरी मैं रोज़ सुनूं,
चेहरा तेरा मैं रोज़ तकूं,
याद तेरी आती है मॉं
पास तेरे बुलाती है मॉं ।

तू जब जब मुझको फोन करे,
तेरे निरंतर ही प्रश्न रहें,
खाया, ना खाया जाने मॉं
घर लौट आया जाने मॉं ।
सोचता हूं कुछ दिन घर आकर,
खालूं भात, चोखा, पापड़,
तब फिर तुम गले लगाना मॉं
आंचल में मुझे छुपाना मॉं ।

-धन्यवाद
जय हिंद ।

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